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सब पढ़ाते हैं होशियार को, कमजोर को पढ़ायेगा कौन?

टाॅपर्स को ही दाखिला देने वाली यूनिवर्सिटी अगर आती है टाॅप तो इसमें क्या चमत्कार?

विकास अग्रवाल
काशीपुर: चाहें निजी प्राइमरी स्कूल हों या दिल्ली यूनिवर्सिटी सभी अपने यहां पर होशियार बच्चों को ही एडमिशन देना चाहते हैं। इसके लिए स्कूलों/यूनिवर्सिटीज द्वारा कट आॅफ लिस्ट निकाली जाती है। एन्टरेंस एक्जाम लिये जाते हैं। कहीं-कहीं तो बच्चों और उनके अभिभावकों का बौधिक  लेवल भी जाना जाता है। कोई भी स्कूल पढ़ाई में कमजोर बच्चों को एडमिशन देने को तैयार नहीं होता। और तो और कमजोर बच्चों को स्कूल से निकाल और दिया जाता है।
विदित हो कि स्कूल/काॅलेज और विश्वविद्यालय बड़े-बड़े दावे कर बच्चों को अपने यहां एडमिशन लेने के लिए आमंत्रित करते हैं। लेकिन जब बच्चा वहां एडमिशन लेने जाता है तो उसे एडमिशन लेने के लिए कहीं एन्टरेंस एक्जाम देना होता है तो कहीं उसे 97% से भी ज्यादा नंबरों की आवश्यकता होती है। ऐसे होनहार बच्चे जब किसी स्कूल/कालेज का हिस्सा बनते हैं तो उन पर अध्यापकों को कम मेहनत करनी पड़ती है और उनके अच्छे परीक्षा परिणामों के कारण स्कूल/कालेजों का नाम रोशन होता है। जहां स्कूल अपने यहां से 90 प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों के नाम और फोटो अपने पैम्फलेट्स में छपवाते हैं तो वहीं कालेज अपने यहां से सबसे ज्यादा वेतन पर किसी नामी कंपनी में चयनित होने वाले बच्चों के नाम को प्रचारित-प्रसारित करते हैं और उन के दम पर भारत में कालेजों की रैंकिंग में अपना स्थान बना लेते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब स्कूल/कालेजों द्वारा होशियार बच्चों को ही एडमिशन दिया जाता है तो उसमें स्कूल/कालेजों की अपनी काबिलियत क्या है। होशियार बच्चा तो जहां से भी पढ़ेगा समाज में अपनी जगह बना ही लेगा। हांलाकि उसका यह हक भी है कि उसे अच्छे स्कूल में पढ़ने का मौका मिले। लेकिन स्कूलों/कालेजों की काबिलियत तो तब है जब वे पढ़ाई में कमजोर बच्चों को पढ़ाकर होशियार बनायें और जब उनका एडमिशन अच्छे स्कूल/ कालेजों या अच्छी कंपनी में बढ़िया वेतन पर चयन हो तो वे भी इस बात पर इतरायें कि उन्होंने एक कमजोर बच्चे को अपने दम पर एक ऊंचे मुकाम पर पहुंचा दिया।
सोचने की बात यह है कि जब हर स्कूल या कालेज होशियार बच्चों को ही पढ़ायेगा तो फिर कमजोर बच्चों का क्या होगा। वे या तो बेरोजगार रहेंगे या कहीं पर छोटी-मोटी जगहों पर नौकरी या छोटा-मोटा रोजगार कर अपना जीवन गुजर बशर कर रहे होंगे।
स्कूल/कालेजों को इसके लिए स्वयं आगे आकर पढ़ाई में कमजोर बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और अपनी बढ़िया पढ़ाई (जिसका वे दावा करते हैं) के द्वारा उन्हें भी 90% से ज्यादा अंक पाने वाले बच्चों की श्रेणी में खड़ा कर अपनी रैंकिंग सुधारनी चाहिए। यदि वे ऐसा कर पाये तो उन्हें भी स्वयं पर गर्व होगा।

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