कहानी – धन्यवाद : वर्षा श्रीवास्तव

छिन्दवाड़ा/म.प्र. (महानाद) : गुनगुनी धूप ने भी चादर पसार ली थी। मौसम कुछ अलग सा लग रहा था। टेबल के एक छोर पर गर्म कॉफी ठंडी हो रही थी… और दूसरे छोर पर हवाओं के छुअन से एक सुंदर से कवर पेज वाली डायरी अपने पन्नों को जैसे स्वयं ही पलट रही थी। वो दाएँ हाथ की उँगलियों से पेन को पकड़े हुए.. कानों में दर्दभरे गीतों को सुनते हुए कुछ सोच रही थी। आज उसे उस लड़के से मिलने जाना था, जिसे उसकी माँ ने चुना था। कितने दिन लगे उसे मनाने में.. पर वो ज़िद्दी इतनी थी कि मानने ही ना वाली थी.. आखिर में माँ को अपना अंतिम हथियार इस्तेमाल करना पड़ा- “पाखी, तुम्हें मेरी क़सम।” फिर उसे मानना ही पड़ा। लेकिन पिछले कई सालों से वो जिस सवाल की कौंध से झुलस रही थी.. वो अब भी जस का तस था।

“क्यों बिना किसी बात के राहुल ने उससे सारे सम्बन्ध तोड़ दिये?? क्या राहुल जानता था उसकी फीलिंग्स के बारे में?? या कोई और बात थी?”

अनगिनत सवाल थे उसके और दिल मे एक चुभन। पाखी और राहुल कॉलेज में मिले थे। जहाँ पाखी चुपचाप रहने वाली पढ़ाकू लड़की थी वहीं राहुल बकैती करने वाला पढ़ाकू लड़का। उनके बीच में पढ़ाई ही एक कॉमन चीज थी क्योंकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे। पर कहते हैं ना कि विपरीत चीजें ज्यादा आकर्षक लगती हैं.. ठीक वैसा ही था यहाँ पर। राहुल प्यार से डरता था क्योंकि वो किसी ऐसे से प्यार करता था जो उसकी नहीं हो सकती, और ये बात पाखी भी जानती थी। पाखी के मन मे राहुल के लिए फीलिंग्स थी किन्तु वो उसे कुछ कह कर उसकी दोस्ती नहीं खोना चाहती थी।

राहुल से जुड़ी हर चीज उसे पता थी.. हर आदत वो जानती थी लेकिन राहुल के लिए वो उसकी दोस्त से ज्यादा कुछ ना थी, शायद इसलिए वो चाहता था कि पाखी किसी को डेट करे। वो अक्सर कहता था -” तुम इतनी सुन्दर हों, तुम्हें तो कोई भी पसंद कर सकता हैं यार।” और उसका जवाब होता “मुझे नहीं पड़ना इन सबमें।” पर वो पड़ चुकी थी। राहुल उसके आस-पास से भी गुज़रता तो उसकी धड़कनें बढ़ जाती। वो उसके साथ वक़्त बिताना चाहती थी… चाहती थी कि एक दिन ऐसा हो जहाँ वो उसको जी भर कर देख सके, जी भर कर सुन सके और जी भर कर जी सके। पाखी के एहसास बढ़ते जा रहे थे.. और वो अपने ही एहसासों से घुटने लगी थी। क्योंकि वो जानती थी कि राहुल किसी और को चाहता हैं। राहुल को बता कर वो अच्छी खासी मित्रता खराब नहीं कर सकती थी।

ठीक चल रहा था सब.. फिर एक दिन उसे पता चला कि राहुल ने शहर छोड़ दिया हैं और बाकी की पढ़ाई दिल्ली में करने वाला हैं। उसे बुरा तो लगा लेकिन उसके अच्छे फ्यूचर को सोचकर वो खुश भी थी। उससे बात करने के लिए उसने राहुल को कॉल किया। पर कॉल नहीं लगा। उसको लगा कोई प्रॉब्लम होगी। वो कई दिन तक लगाती रही… नहीं लगा। उसे फ़िक्र हुई.. उसने राहुल के दोस्तों के पास लगाया.. किसी को पता नहीं था। थक गयी थी वो। ये दिलासा देती रही कि राहुल लगायेगा उसे कॉल। नम्बर नहीं बदला उसने सालों साल।

फिर आया सोशल साइट्स का दौर। किसी तरह राहुल को उसने ढूंढ ही लिया। वहाँ उनकी बात हुई -हाय, हेलो टाइप। लेकिन जैसे ही राहुल ने जाना कि वो पाखी हैं , तो उसने वहाँ से भी बातें करनी बन्द कर दी। पाखी कुछ समझ नहीं पा रही थी.. माँ भी नहीं। पाखी को अक्सर कहीं गुम देखा उन्होंने। कई बार पूछा। पर पाखी पढ़ाई का प्रेसर कह कर टाल देती।

आज 7 साल हो चुके हैं। पाखी जॉब वाली हो चुकी हैं। पापा चल बसे और वो और माँ अकेले रह गये हैं। अपने जाने से पहले पाखी के हाथ पीले करने हैं माँ को। और आज उनकी मुराद पूरी होनी थी। पाखी कौशल से मिलने वाली हैं। कौशल हर ओर से उसके योग्य हैं लेकिन पाखी ने उसकी तस्वीर तक देखने में दिलचस्पी नहीं ली। आज सीधे मिलना हैं। लेकिन विचारों में खोई हुई वो.. आज मुक्ति चाहती हैं। सच्चा वाला मूव ऑन करना हैं उसे। उसने कुछ ना सोचा और मैसेज कर दिया राहुल को उसी साइट के जरिये जहाँ अब वो ब्लॉक नहीं थी। राहुल ने कॉल करने को कहा। पाखी के हाथ-पाँव फूलने लगे। लेकिन उसने कॉल लगाया। वही चिर-परिचित आवाज़। बिना कुछ सोचे पाखी उसपर बरस पड़ी और राहुल हँस रहा था।

अब बारी थी राहुल की और उस जवाब की जिसने पाखी को इतने सालों से अपने गिरफ्त में ले रखा था। ” पाखी, वो मुझे छोड़ गयी थी यार! मेरा दिल दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था। मैं गहरे सदमे में था और होस्टल के मेरे दोस्त चाहते थे कि मैं तुम्हें डेट करूँ। मैं हैरान था कि जो मैंने नहीं समझा वो मेरे दोस्त कैसे समझ गये थे। मैं दुविधा में था। बहुत नफ़रत से भरा हुआ। एक पल को लगा कि तुम्हें डेट करके अपनी हसरतें पूरी करता हूँ और फिर छोड़ दूँगा तुम्हें… मेरा क्या जाता हैं… मैं लड़का हूँ… लेकिन नहीं कर पाया पाखी। मैनें नोटिस किया कि किस तरह तुम्हारी आँखे मुझे देखा करती थी। मैं डर गया कि कहीं मैं तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद ना कर बैठूँ। मुझे यही रास्ता दिखा कि तुमसे दूर चला जाऊँ। तुम अब तक नहीं संभली ये जान कर तुम्हें ये सब कह पा रहा हूँ।” पाखी खामोश थी। राहुल चुप था। गहरा सन्नाटा हो गया। पाखी ने कहा “शुक्रिया।”

“पाखी, जल्दी तैयार हो बेटा ।”

“हाँ माँ… बस हो गयी।”

पाखी जा रही थी नये सफर की ओर। सच को स्वीकार कर और ईश्वर व राहुल को धन्यवाद कर।

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