3 घंटे दुकान खोलने से अच्छा है ‘होम डिलीवरी’ का विकल्प

देहरादून (महानाद) : कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रदेश में 31 मार्च तक जनता कर्फ्यू लगाया हुआ है और आवश्यक वस्तुओं की दुकानों (किराना, सब्जी एवं दूध) को सुबह 7 बजे से 10 बजे तक खोलने का निर्णय लिया गया है।

बता दें कि जहां कोरोना के खतरे से बचने के लिए घर में रहना जरूरी है वहां जिंदा रहने के लिए खाने-पीने का सामान भी उतना आवश्यक है। लेकिन देखने में आ रहा है कि 21 घंटे घर रहने के बाद जब छूट के 3 घंटे शुरु होते हैं तो लोग अपनी आवश्यकता की वस्तु खरीदने के लिए टूट पड़ते हैं। जिस कारण सरकार की सोशल डिस्टेंस की योजना धराशाई हो जा रही है। जब सैकड़ों की तादाद में लोग किराना, दूध व सब्जी की दुकानों पर उमड़ पड़ते हैं तो दूर रहना तो दूर की बात है, सामान खरीदने के लिए एक दूसरे के एकदम पास आ जा रहे हैं। पहले सामान पाने के लिए आपस में धक्का-मुक्की तक कर रहे हैं। जिससे उन लोगों पर कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में फिर पूरे दिन घर में बैठने का क्या फायदा?

जहां सरकार लोगों को कोरोना के खतरे से बचाने के लिए जी-जान से जुटी है तो दूसरी तरफ 3 घंटे के लिए लोगों का इतनी संख्या में एक साथ एकत्र होना उचित नहीं है। ऐसेे में सरकार को चाहिए कि खाने-पीने की इन वस्तुओं के वितरण के लिए होम डिलीवरी सिस्टम को अपनाया जाये। आमतौर पर सब्जियां तो ठेलों द्वारा घर-घर जाकर बेची जाती हैं बस अब सब्जी मंडी को बंद कर उनका वितरण ठेलों के माध्यम से ही ज्यादा संख्या में करवाना चाहिए। वहीं ज्यादातर दूधवाले तो घर-घर जाकर दूध बेचते ही हैं। दूध बेचने वाले दुकानदारों द्वारा भी अपने दूध को ऐसे ही बेचने के निर्देश दिये जाने चाहिए।

स्थानीय प्रशासन द्वारा अलग-अलग मौहल्लों में स्थित किराना दुकानों के फोन नंबर मौहल्लों में पर्चों व फ्लैक्स के माध्यम से सर्कुलेट करने चाहिए ताकि लोग उन नंबरों पर फोन कर अपनी आवश्यकता की वस्तु मंगा सकें। इन वस्तुओं की होम डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए समाजसेवी संस्थाओं व स्थानीय युवकों की मदद लेनी चाहिए। ऐसा करने से सरकार की सोशल डिस्टेंस की इच्छा सही में चरितार्थ हो सकती है।

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