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Monday, February 23, 2026
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यूजीसी (UGC) के नये नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

नई दिल्ली (महानाद) : सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (UGC) के नये नियमों पर रोक लगा दी। कोर्ट ने इसे भेदभाव पैदा करने वाला नियम बताया।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ को अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताते हुए रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि इस नियम को स्पष्ट करने की जरूरत है। तब तक 2012 के पुराने यूजीसी नियम लागू रहेंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की है।

विदित हो कि यूजीसी (UGC) के नए नियमों पर बीते कुछ दिनों से बवाल जारी है। सवर्ण वर्ग के छात्र इन नियमों का विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ भेदभाव पैदा कर सकते हैं। दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक लगा दी है। सीजेआई सूर्यकांत की बेंच कहा कि ये प्रावधान पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया और केंद्र सरकार को रेगुलेशंस को फिर से बनाने के लिए कहा है, तब तक इनका संचालन रोक दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि जाति आधारित भेदभाव क्या है, इस बारे में 2026 के यूजीसी नियमों को अभी लागू न किया जाए। 2012 के नियम तब तक लागू रहेंगे, जब तक यूजीसी नए नियमों की संवैधानिकता की जांच नहीं कर लेता। जीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि एसजी, कृपया इस मामले की जांच के लिए कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करने के बारे में सोचें ताकि समाज बिना किसी भेदभाव के एक साथ विकास कर सके। हमें आजादी मिले 75 साल गुजर चुके हैं और हम जातिगत भेदभाव से अभी भी जूझ रहे हैं। आज अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं और विश्वविद्यालयों में छात्र पढ़ते हैं साथ रहते हैं।

बता दें कि यूजीसी इक्विटी नियमों के खिलाफ याचिकाएं मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल देवान ने दायर की थीं। उनका कहना था कि नए नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि जाति आधारित भेदभाव की कोई भी कानूनी परिभाषा समझदारी पर आधारित होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि कुछ समुदायों को दूसरों की तुलना में ज्यादा सुविधाएं मिल रही हैं। अब ज्यादातर राज्यों में यहां तक कि विधायिका ने भी माना है कि आरक्षित समितियों में भी लोग ‘हैव्स’ और ‘हैव नॉट्स’ बन गए हैं।’ सीजेआई ने कहा कि आजादी के 75 साल के बाद जो भी हमने जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने में हासिल किया है। क्या हम पीछे की ओर जा रहे हैं? जस्टिस बागची ने कहा कि अनुच्छेद 15(4) राज्यों को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा कोई ढांचा नहीं होना चाहिए जिससे शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक विभाजन हो।

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