spot_img
spot_img
Wednesday, October 21, 2026
spot_img

क्या है इमरजेन्सी, जिसका आजकल विपक्ष कर रहा खूब इस्तेमाल

विकास अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट
महानाद डेस्क : आजकल विपक्ष के सारे नेता अघोषित आपातकाल (इमरजेन्सी) की बाते कर रहे हैं और मोदी सरकार के कार्यकाल को इमरजेन्सी से भी बुरा बता रहे हैं। कभी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। कभी मोदी सरकार को वोट चोर बता रहे हैं, कभी संसद मार्च करने चल देते हैं, कभी सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने चल देते हैं। और इस दौरान सभी विपक्षी नेता एक ही बात कह रहे हैं कि इस समय देश में अघोषित आपातकाल लागू है और यह इमरजेंसी के दौर से भी बुरा है। तो आइये जानते हैं आजाद भारत में मात्र एक बार लगी ‘इमरजेन्सी’ के बारे में –

भारत में 1975 की इमरजेंसी : इतिहास, कारण और पूरी कहानी

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का समय सबसे विवादास्पद दौरों में से एक माना जाता है। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया। नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई।

इसे समझने के लिए जानना जरूरी है कि इमरजेंसी अचानक नहीं लगी थी। इसके पीछे आर्थिक समस्याएं, सरकार के खिलाफ आंदोलन, चुनावी विवाद और सत्ता को लेकर गहराता राजनीतिक संकट था।

1. इमरजेंसी से पहले देश में क्या हो रहा था?

George Fernandes,..जब 48 साल पहले जॉर्ज फर्नांडिस के एक इशारे पर रुक गए थे ट्रेनों के पहिए, थम सा गया था देश - coronavirus in india: railway cancellation of all trains reminded the day of 1974 rail strike in leadership of george fernandes - India News - Navbharat Times

महंगाई, बेरोजगारी और असंतोष

1970 के दशक की शुरुआत में देश महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था। गुजरात और बिहार में छात्रों ने भ्रष्टाचार तथा सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किए। धीरे-धीरे इन आंदोलनों को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने लगा।

Best of India: The power of democracy - India Today
जयप्रकाश नारायण का आंदोलन

समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने बिहार के छात्र आंदोलन का समर्थन किया। 5 जून 1974 को पटना में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। उनका आंदोलन भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था और राजनीतिक बदलाव के मुद्दों पर केंद्रित था। विपक्षी दल भी धीरे-धीरे उनके साथ आने लगे।

2. इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला : निर्णायक मोड़

Indira Gandhi Declared Emergency After This Verdict By Justice Sinha 45 Years Ago – I Saw What Happened In Court | BLOG

1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली सीट से जीत हासिल की थी। उनके प्रतिद्वंदी राज नारायण ने चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए अदालत में याचिका दायर की।
  • 12 जून 1975: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। फैसले में चुनावी नियमों के उल्लंघन को आधार बनाया गया और उन्हें छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया गया।

  • 24 जून 1975: सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम राहत दी। वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती थीं और संसद में उपस्थित हो सकती थीं, लेकिन उन्हें मतदान करने की अनुमति नहीं थी।

  • विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी।

    यह फैसला इमरजेंसी की घोषणा से ठीक पहले आया और राजनीतिक संकट का सबसे तात्कालिक कारण बना।

3. 25 जून 1975 को आखिर क्या हुआ?

History Headline: 1971 and now, a tale of slogans | The Indian Express

25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की एक बड़ी रैली हुई। विपक्षी आंदोलन तेज था और सरकार ने इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया।

उसी रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। उस समय संविधान में ‘आंतरिक अशांति’ भी आपातकाल घोषित करने का आधार थी।

26 जून को इंदिरा गांधी ने रेडियो के माध्यम से देश को इमरजेंसी की जानकारी दी। विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

 

सरकार का तर्क : देश में अशांति और अस्थिरता को रोकना तथा व्यवस्था बनाए रखना।

आलोचकों का तर्क: इमरजेंसी का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को दबाने और प्रधानमंत्री की सत्ता बचाने के लिए किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद इसकी घोषणा होने के कारण इस आलोचना को और बल मिला।

4. इमरजेंसी के दौरान देश में क्या-क्या हुआ?

Vidhi-Shastra: NATIONAL EMERGENCY OF 1975

1. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां

जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी समेत कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया। मीसा (MISA) जैसे कानूनों के तहत लोगों को बिना सामान्य मुकदमे की प्रक्रिया पूरी हुए लंबे समय तक नजरबंद रखा गया।

The New Indian Express (@NewIndianXpress) on X
2. प्रेस पर सेंसरशिप

अखबारों को खबरें, संपादकीय और अन्य सामग्री प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी। सरकार की आलोचना करने वाली खबरों पर रोक लगाई गई। इससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जनता तक सूचना पहुंचने पर गंभीर असर पड़ा।

Rukhsana Sultana: Sanjay Gandhi's Enigmatic Right-hand Woman's Role In The Sterilization Campaign
3. जबरन नसबंदी अभियान

इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के प्रभाव में जनसंख्या नियंत्रण अभियान तेज हुआ। कई जगह लोगों पर नसबंदी कराने का दबाव डाला गया और कुछ मामलों में जबरदस्ती भी की गई। सरकारी आंकड़ों और शाह आयोग की जांच से इस अभियान के व्यापक पैमाने का पता चलता है।

4. झुग्गियों पर कार्रवाई

दिल्ली समेत कुछ इलाकों में अतिक्रमण हटाने और शहरी सफाई के नाम पर बस्तियों को तोड़ा गया। तुर्कमान गेट की कार्रवाई इमरजेंसी के दौरान प्रशासनिक सख्ती और आम लोगों की परेशानियों का प्रमुख उदाहरण बनी।

the amendment took place in 1976 was​ - Brainly.in

5. संविधान में बड़े बदलाव

42वें संविधान संशोधन, 1976 के जरिए केंद्र की शक्तियों को बढ़ाया गया और न्यायपालिका की समीक्षा संबंधी शक्तियों पर कई प्रतिबंध लगाए गए। इसी संशोधन से संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए।

5. क्या इमरजेंसी में नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म हो गए थे?

यह इस दौर का सबसे गंभीर संवैधानिक सवाल था।

  • अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए।

  • सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को हिरासत में लिया गया।

  • आपातकालीन आदेशों के तहत कुछ मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जाने के रास्ते सीमित कर दिए गए।

  • 1976 में सुप्रीम कोर्ट के ADM जबलपुर मामले में बहुमत ने आपातकाल के दौरान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर रोक के सरकारी पक्ष को स्वीकार किया। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने इसका विरोध किया।

बाद में इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई। इससे यह बहस तेज हुई कि संकट के समय भी नागरिकों की स्वतंत्रता और न्यायिक संरक्षण की कितनी रक्षा होनी चाहिए।

6. इमरजेंसी कब खत्म हुई और इंदिरा गांधी चुनाव क्यों हारीं?

Janata Party: The giant slayer slayed by own giants | Political Pulse News - The Indian Express

इमरजेंसी करीब 21 महीने चली। आखिरकार इंदिरा गांधी ने जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की।
  1. 18 जनवरी 1977: लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा हुई। राजनीतिक बंदियों की रिहाई और चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत हुई।

  2. मार्च 1977: लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी ने उत्तर भारत में विशेष रूप से अच्छा प्रदर्शन किया।

  3. 21 मार्च 1977: राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त कर दिया गया।

  4. 24 मार्च 1977: मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

इंदिरा गांधी की हार के पीछे नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियां, जबरन नसबंदी, बस्तियों को हटाने की कार्रवाई और विपक्ष के दमन को प्रमुख कारणों में गिना जाता है। इस चुनाव ने दिखाया कि भारतीय मतदाता सरकार के फैसलों के खिलाफ अपना जनादेश दे सकते हैं।

7. इमरजेंसी के बाद क्या बदला?

जनता पार्टी की सरकार ने भविष्य में इस तरह की स्थिति को रोकने के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय मजबूत किए।

  • 44वां संविधान संशोधन, 1978: राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने के आधार के रूप में ‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द लाया गया।

  • आपातकाल की घोषणा के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सलाह जैसी सुरक्षा व्यवस्था की गई।

  • मौलिक अधिकारों के संरक्षण को मजबूत किया गया। अनुच्छेद 20 और 21 के प्रवर्तन को आपातकाल में भी निलंबित नहीं किया जा सकता।

  • आपातकाल की घोषणा की संसदीय स्वीकृति और समीक्षा के लिए अतिरिक्त संवैधानिक शर्तें निर्धारित की गईं।

     

पूरी कहानी एक नजर में

तारीख / वर्ष प्रमुख घटना
5 जून 1974 जेपी का संपूर्ण क्रांति आंदोलन
12 जून 1975 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया
25 जून 1975 राष्ट्रीय आपातकाल घोषित
26 जून 1975 देश को रेडियो पर इमरजेंसी की जानकारी दी गई
1976 42वां संविधान संशोधन
जनवरी 1977 लोकसभा चुनाव की घोषणा
21 मार्च 1977 इमरजेंसी समाप्त
24 मार्च 1977 मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने
1978 44वां संविधान संशोधन

सबसे बड़ा सबक: 1975 की इमरजेंसी बताती है कि केवल संविधान में लोकतांत्रिक संस्थाओं का होना पर्याप्त नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता, निष्पक्ष न्यायपालिका, विपक्ष का अधिकार और नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसी कारण भारतीय राजनीति और संविधान के इतिहास में यह दौर आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

Related Articles

- Advertisement -spot_img

Latest Articles