मोदी-राहुल एक-दूसरे पर अपराधियों को टिकट देने पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन 5 साल में भाजपा और कांग्रेस ने 30-30% टिकट दागियों को बांटे

नई दिल्ली (महानाद) : आज से 5 साल 10 महीने और 8 दिन पीछे चलें तो तारीख आती है- 7 अप्रैल 2014। यह वो तारीख है जब भाजपा ने 2014 के आम चुनावों के लिए घोषणा पत्र जारी किया था। इस घोषणा पत्र में वादा किया “भाजपा चुनाव सुधार करने के लिए कटिबद्ध है, जिससे अपराधियों को राजनीति से बाहर किया जा सके।’ लेकिन 2014 के ही आम चुनाव में भाजपा के 426 में से 33% यानी 140 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले थे। इन 140 में से 98 यानी 70% जीतकर भी आए। इसके बाद 2019 के आम चुनावों में भी भाजपा के 433 में से 175 यानी 40% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। जिसमें से 116 यानी 39% जीतकर भी आए थे। इतना ही नहीं, 2014 के आम चुनाव के बाद से अब तक सभी 30 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हो चुके हैं। इन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 3 हजार 436 उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 1 हजार 4 दागी थे।

मोदी अकेले ऐसे नेता नहीं है जो चुनाव सुधार की बातें करते हैं। बल्कि, कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी राजनीति से अपराधियों को दूर रखने की बात अक्सर कहते रहते हैं। 2018 में ही कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल ने दागियों को टिकट देने पर मोदी पर सवाल उठाए थे। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस ने भी 2014 के चुनाव में 128 तो 2019 में 164 दागी उतारे थे। भाजपा-कांग्रेस ही नहीं बल्कि कई पार्टियां चुनावों में दागियों को टिकट देती हैं और जीतने के बाद राजनीति के अपराधिकरण को रोकने की बातें करती हैं।

2014 के आम चुनावों में 545 सीट पर 8 हजार 163 उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें से 1 हजार 585 उम्मीदवार अकेले 6 राष्ट्रीय पार्टियों में से थे। इन 6 राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा, कांग्रेस, बसपा, भाकपा, माकपा और राकांपा है। इस चुनाव में खड़े हुए 1 हजार 398 यानी 17% उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे थे। जब मई 2014 में नतीजे आए तो 185 सांसद आपराधिक रिकॉर्ड वाले भी चुनकर लोकसभा आए। यानी 34%। भाजपा के 281 में से 35% यानी 98 सांसद दागी थे। कांग्रेस में ऐसे सांसदों की संख्या 44 में से 8 थी।

2019 के आम चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों की संख्या 2014 की तुलना में घट तो गई, लेकिन दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई। 2019 में कुल 7 हजार 928 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें से 19% यानी 1500 दागी उम्मीदवार थे। इस चुनाव में इन सभी 6 राष्ट्रीय पार्टियों ने 1 हजार 384 उम्मीदवारों को उतारा, जिनमें से 496 पर आपराधिक मामले थे। नतीजे आए तो 233 यानी 43% दागी उम्मीदवार चुनकर लोकसभा आए।

पिछले 5 साल में सभी 30 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। सभी राज्यों को मिलाकर 4 हजार 33 सीटें होती हैं। इन सीटों के लिए 39 हजार 218 उम्मीदवार खड़े हुए, जिसमें से 7 हजार 481 उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे थे। इन 7 हजार 481 उम्मीदवारों में से 1 हजार 476 यानी 20% उम्मीदवार जीतकर विधानसभा भी पहुंचे। इस हिसाब से हर 4 में से एक विधायक पर आपराधिक मामला दर्ज है। अगर बात 6 राष्ट्रीय पार्टियों की करें, तो अकेले इन 6 पार्टियों की टिकट पर 2 हजार 762 दागी उतरे, जिसमें से 840 यानी 30% दागी उम्मीदवार जीते।

2014 के आम चुनाव से लेकर अब तक सभी 30 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। सभी राज्यों को मिलाकर 4 हजार 33 सीटें होती हैं। इन सीटों के लिए 39 हजार 218 उम्मीदवार खड़े हुए, जिसमें से 7 हजार 481 उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे थे। इन 7 हजार 481 उम्मीदवारों में से 1 हजार 476 यानी 20% उम्मीदवार जीतकर विधानसभा भी पहुंचे। इस हिसाब से हर 4 में से एक विधायक पर आपराधिक मामला दर्ज है। अगर बात 6 राष्ट्रीय पार्टियों की करें, तो अकेले इन 6 पार्टियों की टिकट पर 2 हजार 762 दागी उतरे, जिसमें से 840 यानी 30% दागी उम्मीदवार जीते।

राजनीतिक पार्टियों की तरफ से चुनाव में आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को इसलिए उतारा जाता है, ताकि वे पैसे का इंतजाम कर सकें। आजकल चुनाव लड़ना वैसे भी महंगा होता जा रहा है, इसलिए पार्टियां ऐसे उम्मीदवार उतारती हैं, जो खुद पैसा खर्च कर सकें। आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों न सिर्फ अपने कैंपेन का खर्चा उठा सकते हैं, बल्कि पार्टी को भी पैसा दे सकते हैं। इसके साथ ही अगर किसी उम्मीदवार के पास पैसा नहीं है, तो उसका भी खर्च उठा सकते हैं। क्योंकि ऐसे उम्मीदवारों के पास संसाधन जुटाने के लिए लोग भी होते हैं।

जहां कई लोग मानते हैं कि वोटर आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार को गरीबी और नादानी की वजह से वोट देते हैं, वहीं मेरा मानना है कि लोग उन्हें सरकार के खराब कामकाज (पुअर गवर्नेंस) की वजह से ऐसा करते हैं। भारत जैसे देश में जहां कानून काफी कमजोर है और लोग सरकार को पक्षपाती माना जाता है, वहां उम्मीदवार अपनी आपराधिकता को काम कराने की क्षमता और विश्वसनीयता के तौर पर पेश कर लेते हैं। यह ऐसी जगहों पर ज्यादा देखा जाता है, जहां लोग जाति और धर्म के नाम पर बंटे हैं। यानी इन जगहों पर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग खुद को रॉबिन हुड (गुंडई से काम कराने वाले) की तरह दिखाते हैं।

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