कोविड-19 ने थामा दिल्ली में उत्तराखंड की रामलीलाओं का मंचन

कोविड-19 ने थामा दिल्ली में उत्तराखंड की रामलीलाओं का मंचन

सी एम पपनैं

नई दिल्ली (महानाद) : शारदीय नवरात्रि मे प्रतिवर्ष दिल्ली के विभिन्न इलाको मे आयोजित होने वाली छोटी-बडी करीब आठ सौ रामलीलाओ मे से करीब दो सौ रामलीलाओ का मंचन, उत्तराखंड के प्रवासी बंधुओ द्वारा, बडी सिद्धत, निष्ठा व भक्तिभाव के साथ, आयोजित की जाती रही हैं।

कोविड-19 विषाणु संक्रमण के बढते असर को देखते हुए, दिल्ली प्रशासन द्वारा इस वर्ष आठ सौ मे से दिल्ली की मात्र बीस रामलीला समितियों को अनुमति प्रदान की गई है। उत्तराखंड की एक मात्र ‘कामधेनु रामलीला समिति’ को मंचन हेतु इजाजत दी गई है। उक्त समिति विनोद नगर, पूर्वी दिल्ली मे विगत सात वर्षों से उत्तराखंड की गीत-संगीत व संवाद आधारित मनोहारी रामलीला का मंचन कर, विगत तीन वर्षो से लगातार कुलदीप भंडारी के नेतृत्व मे दिल्ली पुलिस कमिश्नर के हाथों, प्रथम पुरुष्कार प्राप्त कर, ख्यातिरत रही है।

‘कामधेनु रामलीला समिति’ द्वारा आयोजित रामलीला का मंचन 17 से 25 अक्टुबर तक सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन के मुताबिक रात्रि 8 से 11 बजे तक किया जा रहा है। दर्शक दीर्घा मे मात्र दो सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था। मास्क, शारीरिक दूरी व सैनिटाइजर का प्रयोग। दो सौ दर्शक पूर्ण हो जाने पर गेट बंद करने। दस वर्ष से नीचे व पैसठ वर्ष से अधिक उम्र के वयस्को को प्रवेश की अनुमति नहीं है। मुख्य हिदायतो का पालन आयोजकों द्वारा सख्ती से करवाया जा रहा है।

रामलीला का सीधा प्रसारण रात्रि 8 से 11 बजे तक सोशल मीडिया द्वारा भी प्रसारित किया जा रहा है, जिसे 75 हजार से 1लाख के करीब लोग देख रहे हैं। मंचन के दूसरे दिन, डेन केबल नेट वर्क पर मंचन की रिकार्डिंग को प्रसारित किया जा रहा है।

उक्त आयोजित रामलीला मे, कुल तीस कलाकारो मे, आठ महिला पात्र हैं, जो रामकथा की विभिन्न स्त्री पात्रों की भूमिकाऐ बखूबी निभा रही हैं। आयोजित रामलीला का प्रभावशाली नाट्य निर्देशन सुशील बद्री व सह निर्देशन पुष्कर रावत तथा संगीत निर्देशन नरेंद्र अजनवी द्वारा बखूबी निभाया जा रहा है।

रामलीला मंचन के दौरान दर्शक दीर्घा मे लोगों के एकत्रित होने को लेकर केन्द्र सरकार की कोविड-19 अनलाक गाइड लाइन पांच के देरी से जारी होने व फिर लोगों के एकत्रित होने को लेकर दिल्ली सरकार की गाइड लाइन मे देरी होने से, आयोजक दुविधा मे रहे हैं। गाइड लाइन जारी हुई तो, 31अक्टुबर तक किसी तरह का मेला, खाने की दुकाने, झूला, रैली, प्रर्दशनी और जुलूस पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया था। कारणवश दिल्ली की अनेको अन्य रामलीला समितियों को तालीम हेतु समय न मिलने व जरूरी अन्य अनुमतिया मिलने मे देरी होने के कयासवश, रामलीला समितियों ने हाथ खडे कर, मंचन न करने का निर्णय ले लिया था।

दिल्ली प्रवास मे उत्तराखंड के जनमानस के बीच, रामलीला करवाना, उसमें अभिनय करना, उसे देखना, सभी परंपरागत रूप मे भक्ति भाव से जुड़ा हुआ माना जाता रहा है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है, कि चाहे रामकथा की महती संकल्पना के कारण हो, चाहे रामचरितमानस की लोक प्रतिष्ठा के कारण हो, लोगों का जितना सहयोग रामलीला नाट्य आयोजन मे होता है, उतना किसी भी अन्य नाट्य रूप या सांस्कृतिक आयोजनों मे मिल पाना कठिन है।

अवलोकन कर ज्ञात होता है, कुमांऊ व गढ़वाल के लोकजीवन ने अपनी अस्मिता, अपने संघर्ष और मूल्यबोध को सक्रिय रखने के लिए, जिन कलारूपो का सहारा लिया, उनमे रामलीला का स्थान केन्द्रीय रहा है। एक सार्वभौम कालजयी चरित कथा को पीढ़ियों से लोगों ने अपनी स्थानीयता के अनुरूप अनेक विविध शैलियों व दृष्टियों से प्रस्तुत किया है। रामलीला उत्तराखंड की पारंपरिक नाट्य व आस्था का एक महत्वपूर्ण सम्बल रहा है, जिस परिपाठी का पालन दिल्ली प्रवास मे भी उत्तराखंड के प्रवासी जन निरंतर निभाते आए हैं।

रामकथा को देखना, सुनना और जीवन में उतारना उत्तराखंड के जनमानस की मानसिकता का आदर्श रहा है। इसीलिए रामलीला के दृश्य को अपने अंचलीय स्वभावो के अनुरूप देखने की परिपाठी उत्तराखंडियों मे संस्कारगत है। इसी संस्कार के कारणवश कुमांऊ मे भीमताली व गढ़वाल मे गीत-संगीत व संवाद युक्त मनोहारी रामलीला सु-विख्यात है।

कुमांऊ व गढ़वाल अंचल मे कई स्थानों पर लोकवाद्यो पर लोकगीतो के माध्यम से रामलीला का मंचीकरण किया जाता रहा है। कुमांऊ की रामलीला इस क्षेत्र मे बहुत सशक्त मानी जाती है। कुमांऊनी मे विभिन्न लोक धुनों मे भावो के अनुरूप संगीतबद्ध संवाद लोक शैली मे बडे प्रभावपूर्ण होते हैं।

कुमांऊनी शैली की रामलीला जो मानस के पद व चौपाइयो पर हिंदी गेय शैली में दस रात्रियो तक मंचित किया जाने वाला व दस रात्रियो तक क्रमश: गायकी व विभिन्न रागो पर आधारित है, विश्व के सबसे बडे गीतनाट्य का दर्जा लिए हुए है।

गढ़वाल अंचल की एक और रामकथा ‘रामड़’ भी बहुत लोकप्रिय है। लोक मान्यतानुसार यह विधा आठवी सदी से पीढी दर पीढी प्रचलित व ग्रामीण जीवन मे आत्मसात मानी जाती है। जागर गायन द्वारा अद्भुत मंचन व पात्रों द्वारा मुखोटो का प्रयोग ‘रामड़’ रामकथा जागर नाट्य की विशेषता है।

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