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Sunday, March 8, 2026
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बेटी बोझ नहीं, समाज और परिवार की शान हैं : उर्वशी दत्त बाली

महानाद डेस्क : डी-बाली ग्रुप, काशीपुर की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली हमेशा समाज सेवा में तत्पर रहती हैं और साथ ही समाज में गिरते मानवीय मूल्यों के प्रति भी हमेशा गंभीर रहती हैं। वे समाज में टूटते रिश्तों के प्रति भी चिंतन करती हैं और घर-परिवार टूटने से बचे ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर समस्या के दोनों पहलुओं पर अपने विचार भी रखती हैं। वह कहती हैं कि शादी हर लड़की के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ होती है। वह अपने मायके का आंगन छोड़कर एक नए घर, नए रिश्तों और नए माहौल में कदम रखती है। उम्मीद होती है कि उसे प्यार, सम्मान और सहारा मिलेगा। लेकिन सच्चाई यह है कि शादी के बाद कई लड़कियाँ डिप्रेशन में चली जाती हैं। कुछ अपनी सेहत खो बैठती हैं, तो कुछ हर वक्त सफाई देने और ताने सहते सहते थक जाती हैं।

असल दर्द यह है कि ससुराल वाले बेटी को अपनाने और संभालने के बजाय अक्सर उसे बोझ या नौकरानी समझ बैठते हैं। ताने, अपमान और मानसिक दबाव का बोझ उस पर इतना भारी पड़ता है कि वह अपनी मुस्कान, आत्मविश्वास और कभीदृकभी तो जीने की इच्छा तक खो देती है। सवाल यह है कि अगर किसी परिवार में बेटी को इज्जत और प्यार से रखने की औकात ही नहीं, तो उन्हें शादी करके किसी की जिंदगी बर्बाद करने का हक किसने दिया? मांदृबाप ने उस बेटी को सालों तक अपनी जान लगाकर पाला है। उसकी हर छोटीदृबड़ी ख्वाहिश पूरी की है। उसके हर दर्द में साथ दिया है। उनके लिए वो बेटी सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि गौरव और शान है।

जो लड़की आपको बोझ लगती है, वही अपने पिता का अभिमान है। अगर आपको उसे संभालने की ताकत नहीं, तो कृपया उसे तानों और तिरस्कार में मत डुबोइए। लौटा दीजिए। क्योंकि जब अपनी बेटी किसी ने 24-25 साल तक पाली है, तो आगे भी पाल ही लेंगे… लेकिन किसी के अपमान और अत्याचार में डूबते हुए अपनी बेटी को देखना किसी भी पिता के लिए सबसे बड़ा दर्द है।

उर्वशी बाली दूसरे पहलू पर भी चर्चा करती हैं और कहती है कि बेटियों को भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति गंभीर होना चाहिए। उन्हें भी सच को संतुलन के साथ देखना चाहिए। जिस तरह ससुराल वालों की ज़िम्मेदारी है कि बहू को सम्मान और अपनापन दें, उसी तरह बेटियों का भी कर्तव्य है कि वे अपने संस्कार और व्यवहार को याद रखें। बहुत सी लड़कियाँ अच्छे संस्कारों और सकारात्मक सोच के साथ नए घर में जाती हैं और वहां एक प्यारी गृहस्थी बसाती हैं। लेकिन कुछ लड़कियाँ शिक्षा या आर्थिक स्वतंत्रता के कारण अहंकार से भर जाती हैं। वे यह जताने लगती हैं कि ‘घर तो मैं चला रही हूँ, क्योंकि मैं पैसा कमाती हूँ।’ यह मानसिकता भी रिश्तों में खटास भर देती है।

बेटी जब बहू बनकर जाती है, तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका उद्देश्य एक घर बसाना है, न कि अपने अहंकार या स्वतंत्रता का प्रदर्शन करना। एक सच्ची बहू वही है जो अपने संस्कारों और समझदारी से घर को जोड़ती है, न कि तोड़ती है। इसलिए समाज को दोनों पहलुओं पर ध्यान देना होगा।

परिवार को चाहिए कि वे बेटी को सम्मान और प्यार दें, क्योंकि वह बोझ नहीं बल्कि शान है। और बेटियों को भी याद रखना चाहिए कि शिक्षा, पैसा और आधुनिक सोच रिश्तों से ऊपर नहीं होते। असली ताक़त गृहस्थी बनाने में है, न कि उसे बिगाड़ने में।

जब दोनों पक्ष अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझेंगे, तभी शादी सचमुच दो परिवारों का मिलन कहलाएगी और मायका व ससुराल दोनों खुशहाल होने से समाज में एक खुशनुमा संदेश जाएगा।

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