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Tuesday, June 23, 2026
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लैंसडाउन का नाम बदलने की कवायद तेज, ‘जसवंतगढ़’ के नाम से मिल सकती है पहचान…

Uttarakhand News: उत्तराखंड के पौड़ी जिले में स्थित लैंसडाउन का नाम बदलने वाला है। बताया जा रहा है कि इसकी कवायद तेज हो गई है।  लैंसडाउन सैन्य छावनी बोर्ड ने लैंसडाउन नगर का नाम बदलकर 1962 के भारत-चीन युद्ध के नायक शहीद जसवंत सिंह के नाम पर ‘जसवंतगढ़’ करने का सुझाव दिया है। कैंट बोर्ड में इसका प्रस्ताव पारित हो गया है। अब रक्षा मंत्रालय को ये प्रस्ताव भेजा जाएगा।

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार छावनी बोर्ड के अध्यक्ष ब्रिगेडियर विजय मोहन चौधरी की अध्यक्षता में इस हफ्ते हुई बैठक में लैंसडाउन का नाम बदलकर महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह के नाम पर जसवंतगढ़ रखने का प्रस्ताव पारित किया गया है। बताया जा रहा है कि लैंसडाउन का नाम बदलने के प्रस्ताव को रक्षा मंत्रालय को भेज दिया गया है। प्रस्ताव में यह भी उल्लेख है कि आम जनता लैंसडौन नगर का नाम बदलने का विरोध कर रही है। यदि इस नगर का नाम बदलना है तो भारत-चीन युद्ध के महानायक वीर जसवंत सिंह के नाम पर जसवंतगढ़ किया जाना तर्कसंगत होगा।

पहले “कालौं का डांडा” था नाम

गौरतलब है कि रक्षा मंत्रालय ने पूर्व में छावनी बोर्ड से नाम बदलने संबंधी सुझाव मांगा था। मंत्रालय ने प्रदेश के सैन्य क्षेत्रों के अंग्रेजों के जमाने में रखे गए नामों को बदलने के लिए छावनी बोर्ड से सुझाव देने को कहा था। अंग्रेजों के वक्त में 132 साल पहले तत्कालीन वायसराय के नाम पर इस नगर का नाम लैंसडाउन रखा गया था। इससे पहले इस नगर का नाम ‘कालौं का डांडा’ (काले बादलों से घिरा पहाड़) था।अब तीन दिन पहले हुई छावनी बोर्ड की बैठक में लैंसडौन का नाम वीर शहीद जसवंत सिंह के नाम से जसवंतगढ़ करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

जानें जसवंत सिंह के बारे में

बता दें कि पौड़ी जिले के बीरोंखाल क्षेत्र के बड़िया गांव के रहने वाले जसवंत सिंह ने गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में तैनाती के दौरान 1962 के भारत-चीन युद्ध में हिस्सा लिया था। वह सेला टॉप के पास की सड़क के मोड़ पर तैनात थे। इस दौरान वह चीनी मीडियम मशीन को खींचते हुए वह भारतीय चौकी पर ले आए और उसका मुंह चीनी सैनिकों की तरफ मोड़कर उनको तहस-नहस कर दिया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सेना को 72 घंटे तक आगे बढ़ने से रोके रखा था। युद्धक्षेत्र में असाधारण वीरता दिखाने के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

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