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Friday, July 24, 2026
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काशीपुर के प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि सहोता का शोधपत्र ‘शिशु का प्रथम स्तनपान’ जर्नल ऑफ न्यूबोर्न में प्रकाशित

विकास अग्रवाल
काशीपुर (महानाद) : उत्तराखंड के लिए यह गर्व की बात है कि सहोता मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल काशीपुर के प्रबन्धक एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि सहोता के नेतृत्व में चिकित्सीय टीम द्वारा शिशु के जन्म के पहले घंटे में स्तनपान की शुरुआत को लेकर किए गए एक विस्तृत शोध को न्यूयॉर्क स्थित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ न्यूबोर्न में स्थान मिला है। इस शोध ने न केवल राज्य की चिकित्सा क्षमताओं को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया, बल्कि नवजात शिशु देखभाल में सुधार की एक मिसाल भी कायम की है।

यह शोध प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि सहोता के नेतृत्व में किया गया। टीम में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. नवप्रीत कौर सहोता, डॉ. भारती पंत गहतोड़ी और डॉ. वीना जोशी सम्मिलित रही। इस शोध की मूल भावना यह रही कि नवजात को जीवन के पहले घंटे में मां का गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) प्रदान किया जाए, जो प्राकृतिक टीके की तरह कार्य करता है और नवजात की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है।

शोध की शुरुआत जून 2023 में हुई। शोध के दौरान 12 महीनों तक 756 नवजातों (35 सप्ताह गर्भावधि) पर अध्ययन किया गया, जिनमें 404 सामान्य प्रसव और 352 सिजेरियन केस थे। इस दौयान पाया गया कि शिशुओं में स्तनपान की दर चिंताजनक रूप से केवल 8 प्रतिशत थी। डॉक्टरों की टीम ने पाया कि माताएं प्रसव के बाद थकान, झिझक, अनुभव की कमी, पारंपरिक सामाजिक मान्यताएं, परिवारजनों के पुरुषों की उपस्थिति के चलते नवजात को स्तनपान कराने में संकोच करती थीं। इसके चलते नवजात शिशु, डिब्बा बंद कृत्रिम दूध पर निर्भर हो रहे थे, जिससे उनके पोषण और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।

स्तनपान की इस गिरावट को रोकने और स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए सहोता अस्पताल के शोधकर्ताओं ने ‘गुणवत्ता सुधार परियोजना’ की शुरुआत की। शोधकर्ताओं ने महिला कर्मचारियों को डिलीवरी कक्षों में सक्रिय भूमिका दी, निजी परामर्श सत्र आयोजित किए और माताओं व परिजनों को दृश्य एवं लेख्य सामग्री के माध्यम से जानकारी दी। डिलीवरी से पहले ही जागरूकता बढ़ाने के लिए एक पूर्व प्रसव शिक्षा कार्यक्रम भी शुरू किया गया। प्रयासों के परिणामस्वरूप केवल तीन महीनों में स्तनपान की दर 8 प्रतिशत से 88 प्रतिशत तक पहुंच गई और पूरे वर्षभर औसतन 87 प्रतिशत बनी रही।

डॉ. रवि सहोता ने शोध के दौरान यह भी पाया कि जब तीन महीनों तक उनकी टीम द्वारा कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया गया, तो स्तनपान की दर में पुनः गिरावट देखी गई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि निरंतर मार्गदर्शन और प्रेरणा न होने पर माताएं फिर से पुराने व्यवहार में लौट सकती हैं। इस तथ्य ने स्तनपान को सामाजिक आदत के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता को और अधिक पुष्ट किया।

शिशु स्तनपान बढ़ाने को शोधकर्ताओं के सराहनीय कदम
1-शिशु जन्म के तुरंत बाद स्तनपान: जन्म के तुरंत बाद शिशु को मां की छाती से लगाने की प्रक्रिया अपनाई गई, जिससे मां और शिशु के बीच भावनात्मक बंधन बना और शिशु को ऊष्मा भी मिली।

2-डिले क्लैम्पिंग (नाल काटने में विलंब): नाल काटने की प्रक्रिया को 1 से 3 मिनट तक टाला गया, जिससे नवजात को अधिक मात्रा में रक्त प्राप्त हो सका, जो उसके स्वास्थ्य के लिए लाभकारी रहा।

3-सशक्त प्रशिक्षण और परामर्श: डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और माताओं को स्तनपान की महत्ता और तकनीक पर प्रशिक्षण दिया गया। परिवारजनों को भी इस प्रक्रिया में शामिल कर उनका सहयोग सुनिश्चित किया गया।

4-डेटा ट्रैकिंग और निगरानी:
हर डिलीवरी की समीक्षा के लिए चेकलिस्ट तैयार की गई और नियमित अंतराल पर फीडबैक बैठकों का आयोजन हुआ।

जब यह शोधपत्र 25 जुलाई 2025 को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ न्यूबोर्न में प्रकाशित हुआ, तो यह उत्तराखंड के लिए ऐतिहासिक क्षण बन गया। यह शोध न केवल स्थानीय चिकित्सा व्यवस्था की सफलता का प्रमाण बना, बल्कि यह भी दर्शाया कि सीमित संसाधनों में भी ठोस योजना, इच्छाशक्ति और सामाजिक समर्पण से अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां संभव हैं। यह शोध इस बात का प्रमाण है कि जीवन के पहले घंटे में स्तनपान की पहल न सिर्फ नवजात के स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित हो सकती है, बल्कि इसे सामाजिक आंदोलन बनाकर भारत में बाल मृत्यु दर को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह मॉडल न केवल अन्य अस्पतालों द्वारा अपनाया जा सकता है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में भी इसे समाहित किया जाना चाहिए।

काशीपुर के सहोता हॉस्पिटल की इस पहल ने न केवल बच्चों को जीवन की बेहतर शुरुआत दी है, बल्कि उत्तराखंड को भी चिकित्सा शोध के क्षेत्र में विश्व मानचित्र पर एक नई पहचान दी है। डॉ. रवि सहोता और उनकी टीम को इस उपलब्धि के लिए देश व प्रदेशभर से डॉक्टरों, सामाजिक संगठनों और आम जनमानस की ओर से बधाइयां मिल रही हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों ने इसे नवजात देखभाल की दिशा में मील का पत्थर बताया है और अन्य अस्पतालों को इस ‘बंडल अप्रोच’ को अपनाने की सलाह दी है।

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