महानाद डेस्क : “…. वैश्य ब्राह्मण नहीं है क्योंकि उसका काम धर्म की व्याख्या करना नहीं है, स्वयं विद्या का एक उपदेशक के रूप में प्रसार करना नहीं है। वैश्य क्षत्रिय नहीं है, क्योंकि उसका काम सशस्त्र होकर शत्रु से रक्षा करना नहीं है। वैश्य का काम है धन कमाना, सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए रोटी, कपड़ा-मकान की व्यवस्था करना, ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न करना कि ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्गों के कार्य सुचारु रूप से चलते रहें, समाज के मस्तिष्क और बाहुओं में रक्त संचार होता रहे। पुरुष सुक्त में वैश्य को विराट् पुरुष के ‘ऊरू’ कहा गया हैं- ‘उरू तदस्य यद वैश्यः’ जिस पर सारे शरीर के उठने-बैठने, चलने-फिरने का दारोमदार होता है। यह बोझ जो संभाल सके, वही सही अर्थों में वैश्व है।”
– मरुभूमि का वह मेघ, रामनिवास जाजू, पृष्ठ 401



